अब नरेगा मजदूर ही नहीं, अन्य श्रमजीवी भी मेहनताना भुगतान में विलंब होने पर सरकारी विभागों के खिलाफ मुआवजे का दावा ठोंक सेंगे। कॉम्पेनसेशन ऑफ वेजेज ऐक्ट (वेतन अधिनियम के तहत मुआवजा का प्रावधान) तो पहले से मौजूद था। लेकिन, नौ साल पुराने झारखंड राज्य में पहली बार इसकी सुनवाई के लिये एक सहायक श्रमायुक्त अधिसूचित किया जा रहा है। यह संभव हुआ है नरेगा के आर्किटेक्ट कहे जा रहे चर्चित अर्थशास्त्री डा ज्यां द्रेज की पहल पर।
खूंटी में नरेगा मजदूरों के महीनों लंबित मेहनताने के एवज में मुआवजा की मांग कर रहे डा द्रेज की शिकायत पर राजभवन ने गुरूवार को स्थानीय प्रशासन को फरमान सुनाया कि 24 घंटे में भुगतान सुनिश्चित करे। राजभवन की सख्ती पर ढीले-ढाले प्रशासन में खलबली मच गयी। उपायुक्त सहित कई अधिकारी छुट्टियों पर थे। लेकिन, मामला राजभवन की साख का था। बात शीर्ष अधिकारियों तक पहुंची। वहां पता चला कि वेतन अधिनियम के तहत मुआवजा प्रावधान के लिये आवश्यक अधिकारी ही राज्य में नियुक्त नहीं हैं। चौबीस घंटे में राजभवन के आदेश का पालन कैस हो?
दरअसल, नरेगा के सेक्शन 30 में कहा गया है कि अगर मेहनताना भुगतान में विलंब हो तो कॉम्पेनसेशन ऑफ वेजेज ऐक्ट के तहत मुआवजा दिया जाये। अमूमन हर राज्य में इसके लिये एक अधिकारी प्रतिनियुक्त होता है, लेकिन झारखंड में अबतक नहीं था। आनन-फानन में सचिवालय स्तर से निर्णय लिया गया कि इस कार्य के लिये शुक्रवार को नोटिफिकेशन निकाल कर एक सहायक श्रमायुक्त को ऑथोरिटी सौंपी जाये, जो शनिवार से खूंटी में कैम्प करेंगे। बहरहाल, चौबीस घंटे की जगह, अडतालीस घंटे ही सही! शनिवार से नरेगा मजदूरों को विंलब का यह मुआवजा मिलने लगे तो न केवल उन्हें राहत मिलेगी, बल्कि सुस्त प्रशासन पर भी दबाव बनेगा। आखिर, सरकारी खजाने पर इस बेजा बोझ के लिये दोषियों की शिनाख्त तो शुरू होगी।