जहाँ पर वो निरन्तर भूख की फसलें उगातें हैं.......
जहाँ पर वो निरन्तर भूख की फसलें उगातें हैं........हमारे मुल्क में ऐसे कई लंबे अहाते हैं......जरूरत हैं कि तहकीकात हो ईमानदारी से.........सभी अपराध कुछ न कुछ गवाही छोड़ जाते हैं.......हमारे घर बदल डाले गये शमशानों में यारों........ जहाँ हम रोज मुर्दा हो चुके रिश्ते जलाते हैं........हुआ इतिहास का अनुवाद इतनी बेईमानी से.......जहाँ वाजिब था मातम हम वहाँ खुशियाँ मानते हैं........हमारी नींद के दुश्मन सवालों के जवाबों में ........ हमारे पास सुबह अखबार आतें .......... क्या आदमी गर आज भी सड़कों पे सोता हैं.........इन्हें कुछ मत कहो ये तो फकत मंदिर बनाते हैं..........
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